Saturday, February 3, 2018

"झूठी अम्मा"

झूठी अम्मा

अक्टूबर की मीठी सर्द शाम थी, मैं तेज़ कदमों से मधुबनी रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ रहा था। शाम के छे बजे थे। एक घंटे लेट चल रही दरभंगा से जयनगर जानेवाली पांच बजिया पैसेंजर ट्रेन मिलने की उम्मीद थी। प्लेटफॉर्म पर दाखिल होते ही वहां पसरे सन्नाटे ने बता दिया कि ट्रेन जा चुकी है। अगली ट्रेन आने में देर थी। मालूम हुआ ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर दो पर आएगी। मैं फुटओवर ब्रिज पार कर प्लेटफॉर्म नंबर दो पर आ गया। प्लेटफॉर्म नंबर दो-तीन पर निर्माण कार्य जोरों पर था। निर्माण सामग्री इधर-उधर बिखरी पड़ी थी। वहीं प्लेटफॉर्म के एक कोने में एक बुढ़िया ईंटों को जोड़कर चूल्हे में लकड़ी सुलगा कर कुछ पका रही थी। उसने अपना सारा सामान एक बोरे में रखा हुआ था। दोबारा मेरा ध्यान उसकी तरफ तब गया जब वो चिल्ला रही थी, गे छोरी, एम्हर आबि क खेल, ओम्हर खइस पड़बिही” (ऐ लड़की, यहां आकर खेलो, वहां गिर पड़ोगी।) मैंने देखा थोड़ी दूरी पर  डेढ़-दो साल की एक बच्ची मैले कुचैले कपड़ों में खेल रही थी। कुछ देर खेलते-खेलते उसे नींद आने लगी। वो उस बुढ़िया के बगल में बैठकर ऊंघने लगी। बुढ़िया उसे बार-बार उठाकर कहती बस अभी खाना बन जाएगा। खाकर सोना। आग पर चढ़ी हांडी उतारकर उसने तवा चढ़ा दिया। हाथों से ही रोटियों को थपकियां देकर उसने तवे पर डालना शुरू कर दिया। उसने जल्दी से बोरी से एक थाली निकाली और हांडी से सब्जी के नाम पर उबले आलू निकालकर उसमें परोस दिया। बच्ची गरमागरम रोटी तोड़कर आलू के साथ खाने लगी। दोनों के खा चुकने के बाद बुढ़िया ने सारे बर्तन प्लेटफॉर्म के पियाऊ पर धोया और उसे वापस बोरी में समेटकर सोने की तैयारी करने लगी। बोरी से एक प्लास्टिक निकालकर वहीं बिछा दिया और बच्ची को उसपर सुला दिया। एक रस्सी निकाली और बच्ची के हाथ में बांध दिया और उसका एक सिरा अपने हाथ में बांधकर सो गई।
उन दोनों को देखकर अब तक मेरे मन में कई सवाल उठने लगे। आखिर कौन हैं ये दोनों? बच्ची के मां-बाप कहां हैं। बच्ची अकेली इस बूढ़ी अम्मा के साथ प्लेटफॉर्म पर रहने को क्यों मजबूर है। उस बच्ची के बारे में सोचकर मेरा मन एक अंजान डर से भर गया। कहीं कोई बच्चा चोर उसे उठा ले गया तो। क्या मामूली सी रस्सी उस बच्ची की रक्षा करने में कामयाब होगी? अगर बुढ़िया को  कुछ हो गया तो फिर इस बच्ची का क्या होगा? कौन रखेगा उसका ख्याल? सवाल कई थे, पर जवाब एक भी नहीं।
इस वाकये को दो साल गुज़र गए। इस बीच मधुबनी से जयनगर जाने की भागमभाग में एक-दो बार और उनपर नजर पड़ी होगी। कई बार जी में आया की उनसे जाकर बात करूं। पर जाने क्या सोचकर रुक गया।
आज दो साल बाद इकत्तीस दिसंबर 2017 की शाम चार बजे हैं। मैं एक बार फिर मधुबनी स्टेशन पर पांच बजिया ट्रेन की राह देख रहा हूं। प्लेटफॉर्म नंबर एक पर पत्थर के बेंच पर बैठा में मोबाइल में मैसेजेज चेक करने में मशगूल हो गया। इतने में महसूस हुआ कि भीख मांगती एक आवाज़ पास आ रही है। थोड़ी देर बाद ही वो आवाज़ बिल्कुल पास आकर खड़ी हो गई। मैंने नज़र उठाकर देखा वही बुढ़िया खड़ी थी। वो गिड़गिड़ाती आवाज़ में खाने के लिए पैसे मांग रही थी। मैंने देखा अभी भी उसके कंधे पर एक प्लास्टिक की बोरी टंगी थी और उसके साथ करीब चार साल का एक लड़का खड़ा था। लड़के ने फुल पैंट और नीले रंग का स्वेटर पहना हुआ था लेकिन पैर नंगे थे। उसे देखते ही मुझे उस बच्ची का ख्याल हो आया। मैंने पर्स से बीस रुपये का नोट निकाला और बुढ़िया के हाथ में रख दिया। बीस का नोट देख उसकी आंखों में चमक आ गई। उसने फौरन मेरे सर पर हाथ रखकर आशीर्वादों की बौछार कर दी। मैंने अपनापन दिखाते हुए कहा-मैंने आपको कई बार देखा है यहां। उसने फौरन पूछा- क्या मैं आसनसोल का हूं? मैंने कहा नहीं, मेरा घर जयनगर है। उसके सवाल से लगा शायद वो आसनसोल की है।
मैंने आगे पूछा- वो जो एक बच्ची थी आपके साथ वो नज़र नहीं आ रही। कहां है वो? ये सवाल सुनते ही बुढ़िया थोड़ा संभल गई। कुछ पल रुक कर बोली- यहीं कहीं खेल रही होगी। मुझे उसका जवाब थोड़ा अटपटा लगा। खैर, मैंने उसके साथ खड़े लड़के की तरफ इशारा करते हुए पूछा, ये कौन है? उसने कहा- मेरा पोता है, गोलू। मैंने अपने बैग से एक चॉकलेट निकालकर गोलू की तरफ बढ़ा दिया। बच्चा उसे हाथ में लेकर निहारने लगा। बुढ़िया अपनी धुन में सुनाए जा रही थी, कैसे वो एक बार वो दरभंगा से लौट रही थी तो कुछ उचक्कों ने उसकी बोरी छीन ली। जिसमें खाना पकाने के लिए कुछ बर्तन और राशन का सामान था। तबसे वो खाना नहीं बनाती। भीख मांगकर पैसे जुटाती है और सड़क किनारे सस्ते होटल में जाकर पेट भर लेती है। वो लगातार बड़बड़ा रही थी लेकिन मेरा मन उस बच्ची के बारे में सोचकर उद्धिग्न होने लगा।
आखिर कहां गई होगी वो बच्ची? कहीं कोई उसे छीन तो नहीं ले गया। कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया। मेरे मन का वहम अब शक में बदलने लगा। कहीं इस बुढ़िया ने उसे किसी के हाथों बेच तो नहीं दिया। उसकी जगह कोई और बच्चा ले आई हो। कहीं ये बच्चा चोर गिरोह की सरगना तो नहीं है।
चॉकलेट खाते-खाते उस बच्चे ने पानी की फरमाइश की- अम्मा, पानी दो। बुढ़िया ने बोरी से एक बोतल निकाली और पास के पियाऊ से पानी लेने चली गई।
मेरा मन अब उस लड़के को लेकर भी चिंतित होने लगा। इसी उधेड़बुन में मेरी निगाह उस पर गई जो अभी तक बड़ी सावधानी से चॉकलेट के छोटे छोटे टुकड़े काटकर खा रहा था। मुझसे निगाह मिलते ही वो हंसा और पास आ गया। मैंने भी प्यार से उसके सिर पर हाथ फेर दिया।

उसने हंसते हुए कहा- मेरी अम्मा सबको झूठ बोलती है कि मेरा नाम गोलू है। मेरा नाम तो आरती है

Thursday, May 15, 2014

चौमासा - बिरह गीत

प्रथम मास अषाढ़ सुंदर
श्याम हमर विदेश यौ...
कौन विधि हम मास खेपब
के हरत दुख मोर यौ...
सावन चमकति हृदय करकत
आजि नहिं नंदलाल औता
जीवन आब कौन काज यौ...
भादौ निशि अंधियारि चौदिश
विविध रंगक शब्द यौ...
श्याम सुंदर कुबजि वश भेल
रहल अब मोही तेज यौ...
आसिन आस लगाय अब हम
बितल चारू मास यौ...
राम-कृष्ण मुरारी भज मन
बितित केल चौमास यौ...

गायिका - अंबिका देवी

Monday, December 23, 2013

अनसुनी आवाजें - जनसत्ता के संपादकीय पृष्ठ पर 17.01.14 को प्रकाशित

वो अपनी नन्हीं बाहों को खींच खींचकर लंबा करता और ताड़ के पत्तों से बने झाड़ू से बर्थ के नीचे पड़े कूड़े साफ कर रहा था। उम्र यही कोई 7-8 साल होगी, कपड़ों के नाम पर बदन पर मैले-कुचैले चीथड़े झूल रहे थे। बीच-बीच में किसी भोजपुरी फिल्म का गीत भी गुनगुना रहा था। लोअर बर्थ पर पैर नीचे लटकाए बैठे एक सज्जन का पैर उसकी झाड़ू से छू गया, वो चिल्लाया – क्या करता है बे! सुनते ही उसने फौरन अपने गंदे और पीले दांत निपोड़ दिए। नन्ही उम्र में ही गुटखा खाने की लत लग गई थी शायद।
 दिल्ली से जयनगर जानेवाली ग़रीब रथ समस्तीपुर पहुंचनेवाली थी। वो बरौनी जंक्शन पर ट्रेन में चढ़ा था। पानी की खाली बोतलें, चिप्स, बिस्कुट के खाली रैपर, तंबाकू और गुटखे की पुड़िया... यात्रियों की मेहरबानी से कूड़े की कोई कमी नहीं दिखती बोगी के भीतर। बर्थ के नीचे से निकलती गंदगी की ढेर से बोगी खत्म होते-होते कूड़े का अंबार सा लग गया। उसने पूरी ताकत के साथ सारे कूड़े को एसी-3 कोच के दरवाजे से बाहर धकेला। बाहर ट्वायलेट के पास बैठकर कुछ देर तक वो कूड़े में अपने काम की चीजें ढूंढता रहा। ऐसे जैसे वो अपने भविष्य की तस्वीर ढूंढ रहा हो। बिस्कुट, फ्रुट केक, चिप्स, चॉकलेट के रंग बिरंगे रैपर देखकर उसकी आंखों में चमक आ जाती थी। वो हर रैपर को बड़े ही ध्यान से देखता, खंगालता। आखिरकार उसे एक फ्रुट केक का टुकड़ा मिला। उसने फूंक मारकर उसे साफ किया और मुंह में डाल लिया। आधी इस्तेमाल की हुई गुटखे की पुड़िया पैंट में खोंसते हुए वो कोच में फिर दाखिल हुआ और यात्रियों से पैसे मांगने लगा। कहीं से पैसे मिलते तो कहीं से दुत्कार, सबको समान भाव से समेटता हुआ वो मेरी सीट के पास पहुंचा।
मैंने पूछा- नाम क्या है तुम्हारा?
उसने बताया- नीतीश।सुनते ही पड़ोसी यात्री हंसते हुए बोल पड़ा- हे.. हे.. अबे, मुख्यमंत्री होके झाड़ू लगाता है।ट्रेन की गंदगी और सफाई के बहाने राजनीति की चर्चा छिड़ते ही एक और सज्जन बीच में कूद पड़े - नीतीश कुमार राज्य की गंदगी साफ कर रहे हैं और ये ट्रेन की गंदगी साफ कर रहा है। कूपे में कुछ लोग हंसने लगे। हालांकि बिहार जानेवाली ट्रेनों में लालू और नीतीश के नाम पर राजनीतिक बहस लोगों का सबसे प्रिय शगल है लेकिन उस बच्चे को तुकबंदी वाला ये चुटकुला समझ नहीं आया। हालांकि लोगों के हंसने पर उसे कोई खास ऐतराज भी नहीं था। जाहिर है ऐसी ताने भरी हंसी सुनना उसकी दिनचर्या में शामिल होगा।  मुझे अचानक ख्याल आया की बिहार में नीतीश कुमार की सरकार को आए भी करीब साढ़े सात-आठ साल हुए हैं। संभव है मां बाप ने परिवर्तन और विकास की उम्मीद में बेटे का नाम नीतीश रख दिया होगा।ना चाहते हुए भी मैंने वो घिसा पिटा सवाल भी पूछ ही लिया - स्कूल जाते हो?
लेकिन इससे पहले की वो जवाब देता किसी ने उसे झिड़का अबे, भीख मांगता है, कोई काम काहे नहीं करता है।
लड़के के जवाब में सवाल था- भीख मांग रहे हैं ?  झाड़ू लगावे में मेहनत नहीं पड़ता है का?” उसकी आवाज़ में स्वाभिमान था।खिड़की वाली सीट पर जमे स्थूलकाय सज्जन ने लड़के का साथ दिया और मुंह में रखे पान को संभालते हुए सर को थोड़ा ऊपर और आंखें नीची करके गुलगुलाते हुए स्वर में बोले- झाड़ू के लिएऐसा मत बोलिए भाई साब, दिल्ली में देखे नहीं झाड़ू का खेला। आम आदमी पार्टी वाला सब कइसे बड़का बड़का नेता लोगों का गरदा झाड़ दिया है। ई लड़का लोग भी आगे चल के आप पार्टी का नेचुरल सपोर्टर बनेगा।मुद्दे को भटकता देख लड़के ने आखिरी कोशिश की – पइसा देना है त जल्दी से दीजिए, हमरा औरो बोगी देखना है। आपलोगों जैसा गपास्टिंग से पेट नहीं भरता है हमारा।     मेरी दिलचस्पी उसमें बढ़ने लगी। मैं उसके रहन- सहन के बारे में सब जान लेना चाहता था। मेरे भीतर के पत्रकार ने एक और सवाल दागा। कितना कमा लेते हो एक दिन में?
इतनी देर में वो शायद मेरे सवालों से उकता चुका था।बोला- एतना सवाल काहे पूछते हैं? जो देना है जल्दी से दीजिए और नक्की करिए। सवाल पूछ- पूछ के करोड़पति बना दीजिएगा का?
हमारे सवाल जवाब का सिलसिला कुछ और चलता कि अचानक उसकी नज़र बोगी के दूसरे छोर पर पड़ी, उधर देखकर उसके चेहरे का भाव अचानक बदल गया और वो गुस्से और हिकारत के साथ चिल्लाया रे राहुलवा, भागले रे स्साला हमरा बोगी से, साला झाड़ू लगइली हम आ पइसा लेवे हइ तू हरामी इतना कहता हुआ वो उधर की ओर लपका जहां राहुल नाम का उसका हमउम्र लोगों से पैसे मांग रहा था। दोनों बच्चे हाथ में झाड़ू लिए बोगी पर अपने हक़ को लेकर झगड़ने लगे। ट्रेन के शोरगुल में उनकी आवाज़ कहीं गुम होती चली गई।  

भरि गिलास चाय

सांझ पहर प्रगति मैदान सं नॉर्थ कैंपस जेवाक लेल बस पकड़लौं। सीट नाहि भेटल से हमहूं बाकि जका एक कात देख क उपरका रॉड पकड़ि क टंगि गेलौं। हमरा सामने के सीट पर दू गोटा मैथिली में गप करैत रहि। एक गोटा खिड़की कात में बैसल आंखि फाड़ि-फाड़ि क दिल्ली दर्शन में तन्मय रहे आ दोसर टूरिस्ट गाइड जका  दिल्ली के जानकारी देव में लागल रहै। बातचीत से लागल जे पहिल गोटा नभ-नभ दिल्ली में पहुंचल रहि। दोसर पहिने से दिल्ली में कोनो फैक्ट्री में मजदूरी करैत रहै।
वो अपन अनुभव नभका छौरा के सुनावैत जाइत रहै। "हमर फैक्ट्री में मजदूर सब के बड मान दान हो छै, सरदार मालिक अपन बच्चा जका हमरा सब के मानै छै।"
                                                       ई सुनिते नभका मजदूर आंखि में खुशी आ आस के मिलल जुलल भाव लेने ओकरा दीस तकलकै। पुरनका मजदूर अपन धुनि में सुनावैत जाइत रहै। "रोज काम शुरू होइ स पहिने भरि गिलास चाय सब मजदूर के भेटै छै।" उ जे लस्सी बला गिलास नै होइ छै तहि में भरि गिलास चाय दइ छै। आ सबके पीय परै छै। ना नै कहि सकै छी।
मालिक अपना हाथ से सबके चाय दै छै।
नभका मजदूर अचरज में ई गप सुनैत रहै। बीच में टोकलक- आरौ बहिं ऐना कत होइ छै रौ।
                                                   पुरनका मजदूर आगा बतैलक जे मालिक सब मजदूर के अपना समांग जका मान करै छै। सांझ में काम खतम भेला के बाद एक भरि गिलास चाय फेर भेटै छै। चाय पीने बिना मालिक नै जै दइ छै।
हमहूं ई वार्तालाप सुनैत रहि। बड़ी काल तक सोचैत रहलौं कि आखिर दिल्ली में एहन कोन मालिक हेतै जे अपन मजदूर सबके अते चिंता करै छै। ई सब विचार करैत किंग्सवे कैंप पहुंच गेलौं।
अगिला दिन संगीत नाटक अकादमी में मित्र भारती जी स भेंट भेल। भारती जी संग गप सरक्का में हम दुनु मजदूर के बातचीत के चर्चा केलियन।
तहन भारती जी हमरा समझौला - यौ नइ बुझलिय, दिल्ली के सरदार फैक्ट्री मालिक सब मजदूर से बेसी काज निकालै के लेल ओकरा अफीम आ गांजा मिलल चाय रोज पियावै छै। मजदूर सब अफीम के नशा में खूब काज करै छै आ ऊपर से ओकरा पर एहसान ई की मालिक रोज दू गिलास चाय पियावै छै। एक बेर मजदूर के अफीम बला चाय के लत लागि गेल तहन ओकरा दोसर ठाम मन नै लागि छै। ऊ घूमि घूमि के ओतै जाति छै।
"एकरा कहै छै एक तीर से दू टा शिकार"

Tuesday, March 18, 2008

नानी के पिटारा स

एक मच्छर के तीन टा कनिया, सब स बेसी मान दान बड़की कनिया के रहै, ताहि स कने कम मझली के दुलार। मगर छोटकी के ओ कनिको नहि मानै। एक बेर मच्छर शिकार पर निकललाह। बड देरि भेला पर बड़की चिंतित भ कहली -
सोन सन मुंह, चानन सन टीका कखन औथिन हे...
मझली कनिया ढांढस देलखिन -
सोनित(खून) पीने, भार लदौने आबति हेथिन हे...
छोटकी मुंह बिचका कहलखिन-
ईंह.... चुट कटथिन, चाट मारतैन, दांत निपोरि क पड़ल हेथिन हे...